Monday, August 3, 2015

मेरी श्रदांजली-डॉ. ऐ.पी.जे.अब्दुल कलाम

नई दिल्ली                                                                 ३१.जुलाई.२०१५
आज चार दिन हो गए हैं। पृथ्वी ग्रह के एक सितारे ने इस ग्रह की कक्षा को छोड़ कर अपने अस्तित्व को किसी और दुनिया में चिर काल के लिए प्रतिस्थापित कर लिया। अपने तेज, आलोकिक क्षमता, और हमेशा प्रकाशमान रहने की अद्भुत शक्ति जो पिछले ८४ वर्ष से किसी ना किसी रूप में हमारे बीच में थी वो अचानक एकाएक लुप्त हो गयी जिसका दुःख मुझे विगत ४ दिनों से है। जो मेरी अभी मानसिक स्थिति बनी हुई है शायद वो हर भारतीय की दशा होगी जो किसी ना किसी रूप में हमारे प्रिय कलाम साहब को जानता,  समझता व महसूस करता होगा।
शिलोंग में हुए उनके असामयिक निधन से जो क्षति विश्व समुदाय को किसी ना किसी रूप में हुई है उसकी भरपाई शायद ही में अपने जीवन काल में देख पाऊ क्योंकि एक मानव के अन्दर इतने सारे गुणों का समावेशन होना और उसके बाद भी पूर्ण रूप से सहज रहना क्या यह संभव है?  मेरी समझ तो ना कहती है।
रामेश्वरम के एक मुस्लिम निर्धन परिवार में जन्म लिया। बेहद गरीब परिवार से तालुक रखने के बाबजूद अपने सपनो से कभी समझोता नहीं किया और शायद यह उनकी दृढ इच्छा शक्ति का ही प्रभाव रहा होगा की एक साधारण सा दिखने वाला बालक इतनी दूर की रेस लगाएगा यह तो शायद ज़ेनुलाब्दीन और आशियम्मा ने भी स्वप्न में नहीं सोचा होगा। जीवन के पड़ाव में उन्होंने कई सारे रोल अदा किये और हर कुशल कलाकार की तरह हर कार्य को बखूबी सम्पादित किया फिर चाहे वो अभियांत्रिक की भूमिका हो या एक वैज्ञानिक के रूप में देश के अन्दर आविष्कार की क्षमता को सृजित करने की प्रवति को प्रभावी रूप से विकशित करना। एक शिक्षक के रूप में बच्चों से अतिशय लगाव और युवाओ के सपनो को पंख देना हर भूमिका में हमारे कलाम साहब ऐसे रच बस जाते थे की क्या कहना।
एक अखबार बेचने के जॉब से लेकर गणतंत्र के सबसे उच्च पद का बड़ा ही कुशलता और जिम्मेदारी से निर्वहन किया और ये सब वो पहलु है उनके व्यक्तित्व के जो आज़ाद भारत को विश्व रुपी मंच पर गर्व से खड़े होने का अवसर प्रदान करते है। विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र में राष्ट्रपति पद से सुशोभित होने के बाद भी क्षणिक मात्र भी अहंकार उनके अन्दर व्याप्त नहीं था। पंडित नेहरु के बाद वे ही ऐसे दुसरे शख्स थे जिनको बच्चों से बेहद लगाव था और बच्चे भी बेझीझक अपने प्रिय राष्ट्रपति से बड़ी ही प्रसनन्ता से मिलते थे। यही उनकी संजीदगी का कमाल था की हर जाति, धर्मं, सम्प्रदाय, अमीर-गरीब, देश-विदेश, हर कोई इनको अपना मानता था और इन्ही गुणों के कारण इनकी चमक धरातल के हर कोने पर पड़ी।
आज उनके निधन के बाद ये सारी बातें मेरे जेहन में बार बार आ रही है. जब भी टेलीविज़न ऑन करता हू उनके प्रति सम्मान का भाव दुगना हो जाता है और दूसरी तरफ मन व्यथित हो जाता है क्योकी मेरे मन को कभी भी अप्रिय घटना को सुनने की आदत नहीं रही है लेकिन सच को सुनने का भाव तो विकसित करना ही होगा तभी हम दुःख के सागर में से शनै-शनै: निकल पायेंगे। २७ जुलाई की शाम को रोज़ की तरह कार्यालय से लौटने के बाद शाम को टी.वी ऑन किया तो पता चला की किस तरह वो छात्रों के बीच में उपस्थित होकर संवाद कर रहे थे कि अचानक ही दुनिया से रुखसत होने का उनका समय आ गया था और प्रहार के रूप में हद्याघात उनको हुआ। अचानक से ज़मीन पर निश्चेत होकर गिर पड़े और उसके २ घंटे बाद एक दुखद सन्देश सुनने को मिला की “मिसाइल मैंन अब्दुल कलाम का निधन हो गया”
में तीव्र पग भरते हुए कमरे की तरफ चला जिसमें टेलीविज़न उनकी और उनसे जुडी यादों को दिखा रहा था। मेरे मन के लिए यह अत्यंत दूरूह था की में सत्य को मानू. आखिर मेरा रिश्ता ही क्या था जो में अपने आप को दुःख रुपी चादर में लपेटू लेकिन कुछ रिश्ते खून के रिश्तों से भी बढ़ कर होते है जो हर रिश्ते पर भारी बैठते है और यह भी उनमें से एक था। मेने उसी समय अपने मित्रों रोहित और कौशलेन्द्र को उनके निधन की सूचना दी और कोशिश की अपने दुःख को किसी ना किसी रूप में साझा किया जाये और फिर मेरी आधी रात टेलीविज़न और उनकी यादों के साथ गुजरी.
बड़े भारी मन से सुबह जगा और अपने कार्यालय पंहुचा, रास्ते में कई समाचारपत्रों को ख़रीदा सिर्फ इस विश्वास के साथ कि उनकी जीवन की किताब के कुछ और पृष्ठ मुझे पढने को मिल जायें। ऑफिस में भी आधा समय सिर्फ इन्टरनेट पर कलाम साहब के द्वारा कही गयी बातों को पढने और समझने में बीत रहा था। मन में एक कसक थी की जितना में उनको जानता या महसूस करता था उससे ज्यादा शायद अब उनको दुनिया से रुखशत होने के बाद जान पा रहा हु।
एक पश्चाताप भी हो रहा था कि अपने जीवन में किसी ऐसी उपलब्धि को नहीं छुआ की उनसे मिलने का मौका कभी मिला हुआ होता. शाम को जब यह समाचार पता लगा की सरकार ने उनके अंतिम दर्शन के रास्ते आम जनमानस के लिए खोल दिए तो में अपने आपको भाग्यशाली समझा और सोचा कुछ भी हो जाये अब ये मौका हाथ से नहीं जाने दुँगा क्योंकि एक बार कोहिनूर भारत के हाथ से चला गया तो हम आज इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बाबजूद उसके दीदार को तरश्ते है सो मुझे तो अब हर हाल में अपने प्रिय जनमानस के राम डॉ कलाम साहब को श्रदांजलि देने जाना ही था। काफी थके हुए होने के बाबजूद मन में एक उत्साह का भाव था की पहली और आखिरी बार ही सही बस वहां जाना है। मेने अपने मित्र रोहित को बुलाया की आखिरी बार उस महात्मा के दर्शन कर लो और कहा की यह शायद तुम्हारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण होगा और तुम भाग्यशाली हो कि मेरे साथ आपको ये अवसर प्राप्त होने जा रहा है। मेरे शब्दों के सन्दर्भ में उसकी नकारात्मक प्रतिक्रिया ने मुझे निराशा प्रदान की लेकिन अगर आप बहरे इंसान को संगीत का कोई बहुत ही कर्णप्रिय राग सुनाते हो और उम्मीद करते हो की वो आपको धन्यवाद् बोलेगा तो ऐसा कर के आप अपनी मुर्खता को सिद्ध कर रहे है, और यही शायद मैंने उस वक़्त किया.
फिर भी जैसे तैसे हम १०, राजाजी मार्ग पहुचें जो कि दिवंगत कलाम सर का निवास है। ऑफिस से उनके निवास स्थान का सफ़र तय करने में घडी की सुइयां ८ पी.ऍम. से आगे निकल गयी थी और इसी के साथ सुरक्षा कर्मियों ने कहा: टाइम इज ओवर. आल द ऑफिसियल सिक्यूरिटी मेम्बेर्स हैव लेफ्ट द ऑफिस. यू आर ऑलमोस्ट लेट. मैंने बड़ी मिन्नतै की तो पता चला की आगे के द्वार से अन्दर जाने को मिल जाये लेकिन यहाँ भी वही बात सुनने को मिली कि अब उनके दर्शन की एंट्री बंद हो चुकी है। मन में भाति-2 के विचार आ रहे थे कि शायद अंदेशा होता की कुछ ऐसा होगा तो उनसे कभी आके मिल ही लेते। इंसान होने के नाते सम्भावना और कल्पना के बीच की खाई में गोते लगाना बहुत ही आम बात है और अमूमन इस तरह का आतंरिक व्यवहार हर मनुष्य मोका मिलते ही करने लगता है और यही इंसानी पुतले की ख़ास बात है तो भला में कैसे अलग हो सकता हू और तो और रह-रह कर मन में रोहित के प्रति रोष के भाव आ रहे थे कि अगर यह लापरवाही ना दिखाते तो आज हम नियत समय तक पहुच जाते।
दिल्ली में आने के बाद आँदोलन में भाग लेने से एक चीज़ सीखी की विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल केसे बनाया जाता है और ये अनुभव उस रात को काम आया. जब वहा पर उनके चेहेतों को एकत्रित कर वरिष्ठ अधिकारियों के सामने अपनी माँग को रखा और उनके अंतिम दर्शन की अनुमति प्राप्त की।
उस रात कई तरह के अनुभव सामने आ रहे थे. उनके चाहने वालों में ५ साल के बच्चे से लेकर ७० साल तक के लोगो को उनके अंतिम दर्शन के लिए किसी ना किसी रूप में संघर्ष करते हुए देखा। कोई इलाहाबाद तो कोई बिहार तो कोई देश के अलग-अलग प्रान्तों से आये लोग थे। सभी के चेहरे पर एक गंभीर भाव, आँखों में घोर उत्सुकता, दिल में एक ज़ज्बा, और ओठों पर सिर्फ कलाम साहब का नाम।
बचपन से लेकर आज तक सुना था ये महान थे वो महान थे लेकिन महानता होती क्या है वो उस रात मेने महसूस किया। एक महान व्यक्ति की महानता के क्या मापदंड होने चाहिए इस सवाल का जवाब बस कलाम साहब को जानने भर से मिल जायेगा।
यही सब सोचते-सोचते कब मेरा नंबर आ गया उनके बंगले में प्रवेश करने का पता ही नहीं चला। जैसे ही उनके निवास स्थान के अन्दर प्रवेश किया वैसे ही मन कल्पना और विचारों से भर गया। अरे वो देखो हरी घास पर कलाम साहब टहलते हुए. अरे वो देखो पुस्तक पढ रहे है और कभी कभी वीणा बजाते हुए मुझे वो दिख रहे थे। इस तरह की काल्पनिक सोच बार बार मुझे उनसे मिलने, जानने का एहसास करा देती. जैसे ही मुख्य कक्ष में प्रवेश किया जहा उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था. जिस कमरे में वो कुछ दिन पहले चिंतन मनन कर रहे होंगे उसी कमरे में आज वो चिर निद्रा में लीन थे. कमरे की सामने की दीवाल पर एक बड़ी सी कलाम सर की फोटो और उसके सामने ही तिरंगे में लिपटा हमारे भारत रत्न कलाम साहब का पार्थिव शरीर. मैं बड़े ही दुःख के साथ उनके पास पंहुचा और पुष्प समर्पित किये साथ ही जीवन में आगे बड़ने का आशीर्वाद और कुछ संकल्प के साथ मेने उस मुख्य कक्ष से विदा ली और गार्डन के रास्ते बाहर आया। मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है की सही मायनो में मेने एक महापुरुष को देखा जिसके अस्तित्व को सारे विश्व ने महसूस किया। अब मन हल्का और थोडा भारी था. जब भी सोचता था कि २ दिन बाद कलाम साहब सुपुर्दे-ए-खाक कर दिए जायेंगे तब मन और भी गमगीन हो जाता।
आज निश्चित रूप से वो हमारे बीच में नहीं है लेकिन उनकी कही हुई बातें, उनके विचार, उनके दिखाए हुए सपने और भविष्य के सपनों को सच करने का साहस, एक शांत और हर दिल में अपनी पैठ बनाने की उनकी अदा आज रह-रह कर याद आती है। शुक्र है की आज हम आई.टी युग में पैदा हुए है जिसके दृारा उनको हम ऑडियो और विडियो रूप में देख सकते है और शायद ये कही ना कही मन को तसल्ली देने का एक उम्दा विचार साबित हो सकता है कि आज भी कलाम साहब हमारे बीच में ही है वो फिर चाहे वो तकनीकी रूप में हो या वैचारिक रूप में।
आज कल मेरा अधिकांश समय उनको जानने में बीतता है। एक छात्र होने के नाते मुझे उनके किसी एक विचार को पूर्ण रूप से अंगीकार करना है जो मेरे जीवन की दिशा बदल दे और यही सलाह में मित्रों आपको भी देना चाहुगा। उनकी बताई गयी बातों पर चलें, उनके द्वारा दिए गए सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करें और हो सके तो उनके विचारों, सीख, आदर्शवादिता को स्वयं पर आरोपित करें और फिर देखो कि किस तरह से हमारा जीवन चमत्कारिक रूप से करवट लेता है। सोचो एक कलाम ने तो हमारे देश को इतना आगे लाकर खड़ा कर दिया अगर हम सब उनके विचारों को अपनाएं तो हमारे देश का आगामी भविष्य कितना सुखद होगा और यही सच्चे अर्थों में हमारी कलाम साहब को सच्ची श्रदांजली होगी।  
जय हिन्द कलाम साहब।
शत शत नमन।
आपका
भास्कर राव चौधरी
नई दिल्ली                                                   

5 comments:

  1. Nice way of expressing yourself presenting your thoughts and ideas on Late Shri A.P.J. Abdul Kalam. Somewhat you are correct that his ideas and thoughts will never be waste.... If we apply his thoughts and ideas on are own life... this will give a dramatic changes in our life. Thank you for sharing your valuable thoughts with us.... and also it gives us a new way of thinking and understanding towards the life.

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  2. I m also a fan & admirer of Late APJ Abdul Kalam Sahab.

    U r ri8, we need mny more Kalams 4 saving our India 4m wrong hands.

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  3. क्या बात है महाशय।
    काफी सरल शब्दों में अपने एक ऐसे महान व्यक्ति को अधोरेखित किया है। इसके लिए धन्यवाद।
    ।।

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  4. Good one, fabulous👌👌

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